25 June 2014

न अच्छे दिन हैं,न कडवे ही दिन हैं ये .....

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न अच्छे दिन हैं,न कडवे ही दिन हैं ये 
गरीब की पीठ पर,कोड़े से पड़े दिन हैं ये । 
कड़वे होते तो असर करते नीम की तरह 
मीठे होते तो हलक मे घुलते गुड़ की तरह। 
अंबानियों के महलों में रोशन होते दिन हैं ये 
फुटपथियों के झोपड़ों में सिसकते दिन हैं ये । 

~यशवन्त यश©

6 comments:

  1. यथार्थवादी लेखन

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  2. उम्मीद पर दुनिया कायम है..

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  3. फुटपाथ की झोपड़ियों के दिन कभी फिरते ही नहीं, चाहे पहले, चाहे अबकी बार...
    बहुत उम्दा लिखा है, बधाई.

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  4. अभी तो समय बतानेवाला है क्या होता है ... दिन कहाँ हैं ...

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  5. ग़रीबों के लिए कहाँ बदलती हैँ कहानियाँ! सच लिखा है आपने!
    सादर
    मधुरेश

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