प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

11 May 2020

चाहता हूँ


चाहता हूँ
शाम का यह सूरज
गंगा की तरह
किसी पवित्र नदी में
डुबकी लगा कर
अपने कर्मों का
करले प्रायश्चित
और अगली सुबह
भोर की शुद्ध किरणों का
आचमन कर
हम सब भी
सामाजिक दूरियों से
निकल कर बाहर
हो उठें बेपरवाह
पहले की तरह।

-चित्र (श्रावस्ती भ्रमण 2019) एवं शब्द यशवन्त माथुर©

9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (13-05-2020) को   "अन्तर्राष्ट्रीय नर्स दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-3700)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

    ReplyDelete
  2. सुंदर कल्पना, सूरज की किरणें तो सदा ही पावन हैं, अग्नि शुद्ध ही करती है,बेपरवाही का ही तो नतीजा नहीं है क्या जो आज हो रहा है..

    ReplyDelete
  3. बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete
  6. सुंदर सार्थक सृजन।

    ReplyDelete
  7. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय सर

    ReplyDelete
1261
12026
+Get Now!