ज़िन्दगी का क्या पता
कल रहे न रहे
रहने दो कुछ शब्द
कहे- अनकहे
एक छोटी सी डोर है
जब तक उड़ रही है
छू रही है आसमां
क्या पता कब
बीच से कट कर
मझधार में गिर पड़े।
-यशवन्त माथुर©
12062020
-यशवन्त माथुर©
12062020
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