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05 February 2021

आया नहीं बसंत कि बस.......

छायावाद 
हर कलम से 
कागज पर छपने लगा 
आया नहीं बसंत 
कि बस प्रेम दिखने लगा। 

कोई राधा, कोई मीरा 
कोई गोपियों की बात करता है 
कोई संयोग में रमा-पगा 
कोई वियोगी सा 
व्याकुल लगता है। 

किसी को दिखती है 
पीली बहार 
हर तरफ बिखरी हुई सी 
कोई कोयल के सुरों में खोकर 
गुलाबों को सूँघता है। 

लेकिन 
क्या सिर्फ प्रेम ही विषय है 
आज के इस दौर का ?
जरा उसको भी देख लो 
जो अपने हक के लिये लड़ने लगा। 

आया नहीं बसंत 
कि बस प्रेम दिखने लगा। 

-यशवन्त माथुर©
05022021

25 comments:

  1. वाह,बिल्कुल सत्य कहा आपने।

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  2. और भी मसले हैं..
    प्रेम ही कोई मसला नहीं ..
    विषयांतर कर के मोह ही क्यों बस पनपने लगा..
    बसंत आया नहीं कि , बस प्रेम दिखने लगा..

    सादर प्रणाम..

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (07-02-2021) को "विश्व प्रणय सप्ताह"   (चर्चा अंक- 3970)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --
    "विश्व प्रणय सप्ताह" की   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  4. बहुत सही प्रश्न उठाया है आपने....
    "क्या सिर्फ प्रेम ही विषय है आज के इस दौर का ? जरा उसको भी देख लो जो अपने हक के लिये लड़ने लगा।'

    साधुवाद 🙏

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  5. प्रभावी अंदाज ।

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  6. छायावाद
    हर कलम से
    कागज पर छपने लगा
    आया नहीं बसंत
    कि बस प्रेम दिखने लगा।

    बहुत खूब 🌹🙏🌹

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  7. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति,सादर नमन

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  8. अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो, अरे ओ रोशनी वालों । आपने जो कहा, दुरूस्त कहा यशवंत जी । रूमानियत के परे भी एक दुनिया है जिसे नज़रअंदाज़ करना अपने आप को ही धोखा देना है ।

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  9. आया नहीं बसंत
    कि बस प्रेम दिखने लगा।
    बहुत सुंदर यशवंत जी 👌👌👌फ़ैज़ ने भी लिखा था----------

    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के

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  10. बहुत बढ़िया

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  11. यहां बहुत कुछ है प्रेम से परे भी..बहुत ही सारगर्भित समसामयिक विषय पर लिखी गई कविता..सुन्दर सृजन..

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